सब लोग अपने मन मे
लिए गुमार बैठे है,
उलझन बड़ी है रिश्तों में
सब ऐसे ऐंठे है,
समझने की अब बात कहाँ
बस "मैं ही क्यो?" तो चलता है,
सब अपनी जगह है डटे हुए
यहाँ कोई ना थोड़ा हिलता है,
वो कहते उसने गलत किया
ये ढूंढे उसकी गलती कुछ,
छोटी छोटी बातों पर
सब जाते एक दूजे से रुठ,
अब वो पहले सा प्यार कहाँ
अब वो पहले सी बात कहाँ,
वही प्रेम तलाशे रिश्तों में
हुए हताश ढूंढे यहाँ वहाँ....।
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