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कल, आज, कल

आज का समय कितना ही अच्छा क्यो न हो, फिर भी कल तो याद आता ही है, गुजर गया अब ना लौटेगा कभी बस यादों में रह गया हर पल तो याद आता ही है, कितने किस्से, कितनी कहानियाँ याद करते ये दौर भी गुजर जाएगा, आज याद करते है बीते वक़्त को, आज का ये समय भी कल बीता वक़्त बन जायेगा, कुछ समय बीते कल को याद कर लो, कुछ समय आने वाले कल की बात कर लो, लेकिन लौटकर आज में आ जाना यारो, वरना कल जब कल को याद करोगे, तो आज की यादे ताजा हो जाएगी, बर्बाद किये इस वक़्त की आदत, आने वाले कल को भी खा जाएगी, इसीलिए कल, कल को दो थोड़े पल, और आज के नाम कर दो समय पूरा, कल का सोचकर कल में पछतावा हो, ऐसा ना रह जाये कोई पल आज अधूरा....।

शिक्षा आरम्भ?

समझ नहीं आता आज का समय है कैसा?  शिक्षा में प्रपंच होता शकुनि के जैसा,  कहने को तो शिक्षा आरंभ होती कच्ची उम्र में, घड़े को पकाने की कोशिश, ना चीज को बनाते चीज, यह सब होता है लेकिन समय के थोड़े सब्र में, लेकिन यह सब नहीं जानते, कच्चे घड़े से ही काम मांगते, घड़े में भरेंगे बहुत कुछ ऐसा, जिसका शिक्षा से कोई होगा ना रिश्ता, शिक्षा भी होती है बच्चों की कहा, काम होगा बच्चों का करेंगे माता-पिता, शिक्षा से हटकर हर बात सिखाई जाएगी, अ, आ, इ, ई पूछते हमारी बारी कब आएगी, पैसों से भर दो तुम विद्यालयों की जेब, आपके बच्चे में प्रतिभा नहीं  कहेंगे इसका हमें है खेद, शिक्षा अब सिखाई नहीं जाएगी  बच्चों पर ढोई जाएगी, बच्चों को शिक्षित नहीं  शिक्षा धोने वाला गधा बनाएगी, इन्हीं प्रपंचों के बीच  बच्चों की प्रतिभा खोती है, कागज पर बच्चे बनते जाते शिक्षित  पर वास्तव में शिक्षा आरंभ ही नहीं होती है......।

मायका

बचपन, जवानी, बुढ़ापा,  तीनों समय के अलग है खेल, पर बचपन की बात निराली  नहीं किसी से मेल, पत्नी, मां फिर दादी, नानी  हर पद पर वो चढ़ती है, लेकिन वह घर जहां बचपन बीता  याद वो तब भी करती है, माँ के घर से मायका  जो पीहर भी कहलाए, हर रिश्ते की अलग कहानी  बचपन याद दिलाएं, चाहे जितना भी बीते समय पर  मायका शब्द सलोना, जुबां पर आए जब कभी भी लगे पुकारता वहां का हर एक कोना......।

हर घर तिरंगा

आज जब निकले घर से बाहर गली गली में तिरंगा था, हर एक घर हर कोना भैया तीन रंगों से रंगा था, शान तिरंगे की जब भी देखु गर्व से मन फूल जाता है, लगा था बन गए देशभक्त सब मन में विश्वास न आता है, कुछ देर ये भ्रम रहा फिर पल में चकनाचूर हुआ, सेल्फी हुई अपलोड और  ध्यान तिरंगे से दूर हुआ, कही हवा में लहराता पर कही कही तो झुक रहा, कही है उलझा तारो में तो कही उल्टा लटक रहा, अभियान का मकसद क्या इसका मुझको भान नही, हर घर मे हो तिरंगा पर इस तरह अपमान नही, जनता में देशप्रेम जगाना इतना भी आसान नही, भीड़ में चलने वालों के मन मे तिरंगे का सम्मान नही, जो आधे दिन के बाद ही तिरंगे को भूल जाये, राष्ट्रीय त्यौहारों के बाद जब तिरंगा सड़को पर पाए, साल में दो दिन प्रेम दिखाए बाकी दिन देश को खाते है, देश को धोखा देकर क्यो??? तिरंगे को लहराते है, अभियान का विरोध करना यह मेरा मकसद नही, कहने का अर्थ बस इतना है तिरंगे की गरिमा पर हो चोट नही....।

वीर रस की कवि हूँ मैं

*वीर रस की कवि हूँ मैं* लड़की हूँ यह देखकर समझते है सब श्रृंगार रस की कवि हूँ मैं, पतली सी आवाज है मेरी  नाजुकता की छवि हूँ मैं, पर हर नारी कोमल है यह बात सुनो सब झूठ है, नाजुक, कोमल के साथ शक्ति भी वीरांगनायें सबूत है, श्रृंगार रस में रचना लिखना मुझे तो कहा आता है, वीर रस में लिखना, सुनना आनन्द मुझे दिलाता है, तपन से अपनी रोशन करे चमचमाता रवि हूँ मैं, कोमल, नाजुक नारी हूँ बेशक पर वीर रस की कवि हूँ मैं....। *पूजा ओझा (नूतन पू.त्रि.)*

कौन अनोखा

ना किस्से ना कहानी में, ना बचपन ना जवानी में, बुढापा भी गुजर जाएगा इन कुछ मनमानी में, जरा इस बार अपने आप से पूछो तो बस इक बार, किया है क्या अनोखा तुमने अपनी जिंदगानी में, 2 अगर जवाब में मिले ना तुमको इक अनोखी बात, घमंड ये छोड़ देना हो बड़े जग की कहानी में....।

फुर्सत के पल

*फुर्सत के पल* आज फुर्सत में बैठी थी, तो सोचा प्रकृति से कुछ बाते करू, कुछ उससे पुछु, जानू  तो कुछ अपनी भी बात कहूं, मेरी तरफ से शब्द है  और उसकी तरफ से इशारा, समझने के लिए आंख मूंद कर  लेती मन का सहारा, पुछु कुछ जो मन को भाए  तो ठंडी हवा प्यार से आए, बात कहूं कुछ गुदगुदी सी  पत्तों में वह शर्मा जाए, कह दूँ कुछ जो अनचाहा सा बिजली कडके बादल गरजे, बीच-बीच में बोले प्रकृति  करती रहा करो बातें  लगाया करो ना अरसे,  कुछ ही देर में हम दोनों का  तालमेल कुछ यू बैठा,  वह भी मुझसे जुड़ गई  और मेरा मन भी प्रसन्नता से भर बैठा,  फिर बातों में बातें कुछ निकली  प्रकृति का मन भर आया,  हल्की बारिक बूंदों से  उसने अपना दुःख छलकाया,  बारिश हुई तो भीग जाऊंगी  मैंने कहा चलो मैं चलूं,  तुझको तो पसंद था भीगना  बड़ी हो गई मैं क्यो सहूँ?  दोस्ती में हर भाव है होते  उसने नाराजगी दिखलाई,  अचानक हुई तेज बारिश  और मेरी रचना बह गई,  पर खुशी हुई मुझे इस बात की  ताजा हुई वो यादें  और मै प्रक...

जय परशुराम

ब्राह्मण का एक रूप अनोखा सीधा नही पर सच्चा जान, ब्राह्मण का अस्तित्व बचाने रण में कूदे श्री परशुराम, बुराई के विरुद्ध छेड़ दी जंग सब करने लगे हाहाकार, ब्राह्मण ने उठाया शस्त्र जब बढ़ने लगा अत्याचार, हमे भी चलना नक्शे कदम पर शस्त्र के साथ हो शास्त्र का ज्ञान, शास्त्र ज्ञान जब हो जाये  तभी उठाना शस्त्र और कहना जय परशुराम......। श्री परशुराम जयंती की आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं

माँ

उम्र बढ़ी पर मोह ना टूटा,  कभी भी माँ का पल्लू ना छूटा,  घूमना फिरना सब बेकार था,  मुझको बस माँ के पल्लू से प्यार था,  पहले हाथ छूटा और उभरी नही थी  साथ छोड़ गई माँ, यादे छोड़कर कह गयी  अब जियो मेरे बिना,  पर बहुत मुश्किल है माँ.....

लिखती हूँ खुद पर

लिखती हूँ कभी यहाँ से तो कभी वहाँ से, कभी इस पर तो कभी उस पर, फिर कई बार चिढ़ जाती हूँ खुद से भी, तब सुनाने को खुद को लिखती हूँ खुद पर...। 😁😁😀😀

माँ

जिन कदमो को छूकर हमने जीवन बिताया,  आपके आशीर्वाद से हमने सारा सुख पाया,  आपका साथ और सिर पर आपका हाथ  हमे सुकून देता था,  आपका आशीर्वाद तो जानते है  हमेशा हमारे साथ है,  पर जिन कदमो में हमे स्वर्ग का एहसास होता था  वो कदम कहाँ से लाये माँ........😔😔

अंधेरी रात

अंधेरी है रात माहौल है शांत सन्नाटा चारो और छाया है, कुत्ते के रोने की आवाज से मन बड़ा घबराया है, बत्ती है गुल चल रही है हवा तेज उड़ रही है धूल, शांति है या सन्नाटा जो भी हो लगता है मौसम बड़ा डरावना, ऐसे में घर के बाहर खड़ी हूँ मैं अकेली, डरने की बात क्या? साथ है साथ देने को मेरी कलम मेरी सहेली...।

डर

डर,  जैसे निभानी कोई रीत है, डर, जिससे हो जाती प्रीत है, डर, जिसके साये से भी डर लगता है, तभी तो वो हर कदम पर साथ चलता है, डर, जिससे रिश्ता ना कोई गहरा है, डर, जिसका फिर भी हम पर पहरा है, डर, ना चाहो तब भी आता है, डर, क्यो अपनापन निभाता है? डर, हर मजबूती खाता है, डर, जो भुक्कड़ कहलाता है, डर, ना हो तो सुकून है, लेकिन डर, खिंच लेता जहन्नुम में...।

नेताजी - सुभाष चंद्र बोस

आजादी को हम हर पल हर सांस में जिये जाते है, आजादी के दिन को हम अवकाश की तरह बिताते है, नही जानते कितनी कुर्बानी पर मिली ये आजादी, पढ़कर जोश भरा पल भर का की कैसे लड़े थे नेताजी, आजादी के लिए उन्होंने खून की कीमत मांगी थी, जय हिंद से भरा जोश लाखो ने जान लगा दी थी, शहीदों के देह पर खड़ी  इस आजादी को यू बर्बाद ना कीजिये, नेताजी की याद को रात गयी बात गयी कि तरह यू भुला ना दीजिए, आजादी का महत्व समझकर उनके संकल्प को देना है मान, उनकी मृत्यु एक रहस्य है अब तक शायद आजादी का बाकी है काम....।

वाह क्या मौसम है

वाह क्या मौसम है, बारिश के बाद हवाओ की जो सनसन है, कोहरा दिखता घना घना, जिसके बीच से हल्का सा उजाला छना, मन करता है इस नजारे को रोक लूँ, बेमौसम का मौसम है बीमार करेगा कहते है सब, पर मन को मोहने वाले  इस मौसम के बारे में ऐसा कैसे सोच लूँ? इस मौसम का आनंद लेने को छत पर जाने से खुद को कैसे रोक लूँ???? कैसे कैद करू इस मौसम की याद सोच रही थी? तभी ख्याल आया क्यो ना कुछ लिख लूँ....।

नया साल- 2022

साल की बिदाई हो या नए साल की बधाई हो उत्साह कभी कम नही होता, हिंदुस्तानी को कोई  खुशियां मनाने से रोक ले इतना किसी मे दम नही होता, हम सभी अपने अपने त्यौहार  श्रद्धा-भक्ति से सजाते है, हम हिन्दू तो वर्ष में तीन नववर्ष मनाते है, हम सभी के पास अपने-अपने त्यौहार भरपूर है, फिर भी एक-दूसरे के त्यौहार में हम उत्साह में चूर है, हम हर धर्म के त्यौहार में देश को उत्साह से सजाते है, इसीलिए तो हम अनेको में एक हिंदुस्तानी कहलाते है....। नववर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाएँ।

बिगाड़ना

जिनकी आदत है बिगाड़ने की वो बिगाड़ते रहे, सुधारने की कला हमारे पास भी है ना, ऐसे ही किसी को भी  अपने जीवन से थोड़ी ना खेलने देंगे, पर हाँ वो गिरी हुई हरकत करेंगे  तो हम थोड़ी ना बदले में  अपनी कला छोड़कर  गिर जाएंगे।

अंधेरी राह का सुहाना सफर

*अंधेरी राह का सुहाना सफर* अंधेरी राह पर चल रही हमारी कार, बारिश का मौसम है सामने कांच पर  गिर रही  चमकीले मोतियों की बौछार, सुहानी सी हवा है, सोंधी सी खुशबू बिगड़े मन की दवा है, कार के पहिये  कभी धीमे से तो कभी तेजी से घूम रहे, ऐसा लगता है जैसे वो भी सुहाने सफर की मस्ती में झूम रहे, गाने चलते है रेडियो में पुराने, मन करता है ये सफर थम जाए यही कुछ बने ऐसे बहाने, पर यह मौसम तो कुछ ही समय मे थमेगा, लेकिन जो छवि मन मे छपी इस सफर की, वह यादों की किताब में सुंदर पृष्ठ बनेगा.....। *नूतन पू.त्रि.(ओझा)*

उत्साह बड़ा उत्साही

*उत्साह बड़ा उत्साही* उत्साह शब्द भी बड़ा उत्साही है, जिसके दिमाग मे चढ़ जाता है, उसके जीवन मे उतर जाता है, और जब जीवन मे उतर जाता है, तब हर छोटी बात पर भी  फुदक कर बाहर आता है, इसका समाज बहुत बड़ा होता है, यह हर रूप में खड़ा होता है, किसी मे तो छोटी बात पर भी बाहर आ जाता है, तो किसी मे बड़ी बात पर भी आने में शर्माता है, वैसे तो ये बड़ा शरारती है, कभी मनमोहक तो कभी हठी है, पर इसके सारे रूप निराले है, उत्साही लोग ही तो कहलाते दिलवाले है, निरुत्साही भी सबके दिलों पर  मौज कर दे, पर कोई तो उसके दिल मे भी उत्साह भर दे, क्योकि उत्साह शब्द भी  बड़ा उत्साही है, इसको दिल मे उतार लो, फिर जीवन अपने आप मे शाही है....। *नूतन पू.त्रि.(ओझा)*

शादी हुई तो क्या?

शादी हुई तो क्या? पर मुझको कही तो  वैसा ही रहने दो, कही समझदार बन जाऊँ पर कही तो बच्चा रहने दो, दिल में दर्द दिमाग मे चिंता, सब आता है आएगा, समय को कैसे टालोगे तुम समय तो बदला जाएगा, पर दिल से कहना चाहू मैं, मुझको बात ये कहने दो, हर बात को पार को लेंगे बस दिल मे बच्चा रहने दो, समझ, सीख तो भाव है वो आते आते आएंगे, नया सफर है, अलग है राह, पर चलना सीख ही जायेंगे, कठिनाई तो हर पड़ाव में उसे वही पर रहने हो, पार कर सबको बढ़ जाएंगे, बस दिल मे बच्चा रहने दो......।

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दोस्ती की पहचान

दोस्ती क्या है आज मन मे उठा य़े सवाल है ये सच्ची यारी या है कोई बबाल दोस्ती को समझने के लिए लिया दोस्तो का सहारा तब पता चला ये बबाल नही है रिश्ता बडा ही प्यारा मुझे क्या पता चला वह मैं आपको बताती हूँ मैने कीतना समझा अपनी कविता से आपको सुनाती हूँ की दोस्ती हवाओ का है एक इशारा सुबह की गुनगुनी धूप सा सुनहरा कभी दोस्ती है पूनम के चॉद सी तो कभी नोक झोक मे अमावस की रात सी कभी हो हथेलियो मे शांत कंगन तो कभी खनकती चुडियो की खनखन कभी दुल्हन के होठो पर चमकती हुई लाली तो कभी मनमोहक खुशबू लाल गुलाबो वाली ये है ऐसा रिश्ता जो हर जगह मिल जाए जाए कही भी हम अगर एक नया दोस्त पा जाए कीतने बताऊँ दोस्ती के है कितने सारे रंग सिर्फ इतना पता है यह रिश्ता हमेशा होगा संग सिर्फ इतना पता है यह रिश्ता हमेशा होगा संग

नारी की परिभाषा

नारी की परीभाषा  नारी ही तो है सम्मान आदर की मुरत  नारी ही दिखलाये जीवन मे खुशियो कि सुरत  नारी का करोगे सम्मान आदर मिलेगा  जीवन गुलाब के फूल कि तरह खिलेगा  नारी ही तो भारत मॉ ममता की मुरत है  नारी ही तो देश कि आजादी का स्वरूप है  दुनिया को बनाने वाली नारी माता दुर्गा है  दुनिया को बचाने वाली नारी मॉ कालीका है  दुनिया मे ही एक देश नारी भारत मॉ का है  जिनकि मिट्टी की खुशबु मे हर कोइ बन्ध जाता है देश को बेचने वालो का काल ही तो नारी है  आजादी दिलाने वाली नारी लक्ष्मीबाई है  नारी के है रूप इतने देवि कहलाये वो  हर रिश्ते को सच्चे साफ मन से निभाये वो  मॉ बाबा का बेटी बन सर गर्व से उठाए नारी  तो कभी बहन बन रक्शाबन्धन निभाये नारी  कभी बन पत्नि सात जन्मो का दे साथ नारी  तो कभी मॉ बन ममता बिन स्वार्थ लुटाए नारी  नारी के बिना किसी का कोई अस्तित्व नहीं  बादलो को चिर निकला सुर्य का प्रकाश है नारी बादलो को चिर निकला सुर्य का प्रकाश है नारी