ऐसे ही बैठी थी उलझन मे, जीवन को समझने की कोशिश थी मन मे, तभी आया ख्याल आपका (दादीजी) मन मे जिक्र होने लगा उस समय की हर बात का, आपका वो रुतबा वो व्यक्तित्व का तेज, त्रिवेदी बेंजी नाम से हम सभी की पहचान एक, सर हमारा गर्व से उठता मिलता सम्मान सभी की नजरो मे, आपके नाम से प्रेम, सम्मान पाया है सभी घरो मे, माना सख्ती थी आपकी कड़क थे सारे नियम, पर संस्कारो की पहचान यही यह समझते है हम, आपके संस्कारो का कभी गिरने ना देंगे मान, कभी ख़ुशी कभी गम ही जीवन है पर हम करते है आपका दिल से सम्मान....।
आज अचानक मन बह गया उस और भ्रुण हत्या के मामले दर्ज है चहू और सोचा इस पाप के खिलाफ मैं भी करू कुछ कोशिश ज्यादा कुछ नही तो अपनी कविता मैं ही कुछ लिख भ्रुण हत्या के खिलाफ मैने भी ए...