पाँचवा अध्याय कह रहे अर्जुन
उचित क्या है बताए ये भगवन
कर्म सन्यास या कर्म योग हो
मेरे लिए क्या श्रेष्ठ है ये कहो
कहे भगवान ये दोनो है समान
मुर्ख लोग इसे अलग रहे जान
लिप्त कर्म न मान
कृष्ण वाणी का लो गीता ज्ञान
सुन लो सारा जहान 2
स्वार्थ बिना जो कर्म करता है
निःस्वार्थ मुझमे लिन रहता है
जल से कमल मे पत्ते की भाँति
पाप से लिप्त नही होता है
पाप, पुण्य हम ग्रहण ना करे
परमेश्वर अर्जुन से कह रहे
हर कर्म भुगतना ये जान
कृष्ण वाणी का लो गीता ज्ञान
सुन लो सारा जहान 2
इन्द्रिया, मन और बुध्दि भी
जीत लिया है जिसने वही ही
इच्छा, भय और रहित क्रोध से
वह तो सदा ही मुक्त हुआ है
स्वार्थरहित , दयालु , प्रेमी
शान्ति को प्राप्त हुआ वह ज्ञानी
समाए ये मुझमे मान
कृष्ण वाणी का लो गीता ज्ञान
सुन लो सारा जहान 2
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