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ईश्वर का पैगाम

वाह रे इंसान तु भी कितना खुदगर्ज निकला
ले रहा मुझसे मेरे एहसानो का बदला
सोचा था की तुझको अपने सा बनाऊँ
कण कण और रगो मे तेरी समा जाऊँ
पर एैसा मैं कर ना पाया हुआ ना कुछ भी हासिल
मेरे जैसा बनने को तु नही है काबिल
सोचता है तु मैं जो चाहूं वही होता
पर करता है कहाँ जो कुछ भी मैं कहता
करता है तु अपने मन की सुने ना मेरी बात
रहा कहाँ है तुझको अब मेरे पर विश्वास
मेरे वश मे होता तो दुनिया बहुत अलग होती
ना किसी का खोता बचपन और ना इंसानियत रोती
फैसले लेना काम है मेरा पर चलाता दुनिया तू
अपना जीवन तू ही बेचे अब उसमे मैं क्या करूँ
इस दुनिया को तु ही बिगाडे खोकर अपना होश
फिर बिगडे हालात कही तो मुझको दे दे दोष
यहाँ पर तुझमे और मुझमे कुछ खास फर्क नही
तेरे जैसा मैं भी बंधा हूँ नियम मे कहीं
कई बार तु अपने जैसा मुझको भी समझ लेता
जैसे तोडना नियमो को तेरे लिए आसान होता
पर मैं हूँ इंसान नही जो अपने मन का कर पाऊँ
जिसका जितना कर्म हो उतना ही मैं दे पाऊँ
साथ रहूंगा तब तक मैं जब तक तुम चाहोगे
फुल भी मैं बन जाऊँ जब काँटे होंगे राहो मे
तेरी ख्वाहिश सुन लु मैं पर इच्छा अपनी कह ना सकुँ
बस तु मुझको ढुंढ ना मैं तेरा विश्वास ही हूँ
पैगाम इतना सुन ले मेरा तू इंसान है मै नही
इसलिए नाइंसाफी ना मेरे फैसलो मे कहीं
इतनी आशा ऐ इंसान तुझसे मैं भी रखता हूँ
समझेगा तेरा भला तू तेरे साथ मैं जो करूँ

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