तरक्की के नाम पर स्वयं को बहला रहे
सोचो तो सही जरा ये हम कहाँ जा रहे
कहने को तो हमने सभ्यता समझ ली है
सभ्यता की एक अलग परिभाषा रट ली है
पैसो की खनक, आँखों में चमक
देख दिखावा कितना है
बोली में घमण्ड, छोड़ दी शर्म
पहनावा रत्ती भर जितना है
असल परिभाषा छोड़कर गलत बात अपना रहे
सोचो तो सही जरा ये हम कहाँ जा रहे
अपने देश का भविष्य
परदेशी के कंधों पर टिका रहे
जब अपना ज्ञान महान है
तो बच्चो को जाने क्या रटवा रहे
शिक्षा के नाम पर बस अंग्रेजी ही तो बची है
ज्ञान और अपनी भाषा तो
इतिहास के पन्नो पर सजी है
गुड़, शहद सा ज्ञान छोड़कर
बच्चो को शक्कर में डूबा रहे
सोचो तो सही जरा ये हम कहाँ जा रहे
अच्छी बातों पर शर्म खाते
बुरी बातो को शान से बताते
मर्यादा, नियम, भाव छोड़कर
इंसानियत पर अपना हक जताते
टेक्नोलॉजी की आड़ में अश्लीलता
धड़ल्ले से बिखरा रहे
समझाने को जाओ तो
जीवन की गलत परिभाषाएँ बना रहे
मनोरंजन के नाम पर गलत धंधा परोसे जा रहे
हम भी समझदार अपने बच्चों वही खिला रहे
सोचो तो सही जरा ये हम कहाँ जा रहे
तरक्की के नाम पर स्वयं को बहला रहे
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