आज फिर से शिक्षा को रोते जार जार देखा
पैसो को माँ सरस्वती पर हावी बार बार देखा
शिक्षा मिले जो बच्चों को भविष्य उनका बन जाए
लेकिन माता पिता का पूरा वर्तमान ही ढल जाए
देखो तो क्या भीड़ मची है शिक्षा का व्यापार सजा
एक पिता भी बच्चों को लेकर उसी बाजार चला
ये वो दिन है जब बच्चो का चेहरा खिला खिला होता
नई किताबे, कॉपियों का जोश भरा दिल में होता
पहुँचे जब बाजार तो शिक्षा आशा से महंगी मिली
दूकानदार धीरे से बोला कर दो भाई अब जेब ढीली
जेब में देखा पैसे कम थे पर बच्चों से क्या कहता
खुश चेहरे पर हो उदासी एक बाप कैसे सहता
बच्चो से बोला रे बच्चो पर्स तो अपना भूल गया
बच्चो को दुकान बिठा वो लेने अपना पर्स चला
घर पहुँचा तो चिंतित सा घर का माहौल बना
ये तो पहला साल ही है जाने आगे क्या होगा
फिर बच्चो को सस्ती सी स्कूल पढाने का सोचा
पर मन में ये डर था आगे कौन उन्हें जीने देगा
फिर सहमे जैसे तैसे और अंत में ये निर्णय लिया
बच्चो के खातिर माँ ने गहना गिरवी रख दिया
फिर पहुँचा दुकान तो बच्चे देख पिता को उछल पड़े
उनकी इच्छा हुई पूरी वो हँसी ख़ुशी फिर घर चले
ये तो एक व्यथा है आगे और कहानी बननी है
पैसो के कारण हो गयी बुद्धि सबकी छन्नी है
देश की हालत देख अब विश्वास जहान को ना होता
क्या ये देश वही है जहां शिक्षा को पुजा जाता
परिवर्तन में विश्वास रखते हो और शिक्षा को मजबूरी के दर्जे से हटाकर ज्ञान अर्जन का दर्जा देना चाहते हो तो इस msg को आगे जरूर बढाये।
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