मित्रो जरा आसमान तो देखो
किस तरह काले बादलों से छाया है
गर्मी का मौसम है अभी तो
ये बिन मौसम बरसात लाया है
लोगो को कहते सुना की
प्रकृति भी कहर बरपा रही है
क्यों बेदर्द बनकर हमे तड़पा रही है
जहाँ सूखा है वहाँ पर जाकर बरसो ना
ऐसे बिन मौसम बरसना
तुम्हे शोभा देता है क्या
प्रकृति भी नियम तोड़कर
अंधाधुंध चले जा रही है
ना जाने क्यों ये बिन मौसम
बरसात ला रही है
लोगो की यही बाते सोच रही थी
की तभी सनसनाता एक झोंका आया
साथ में अपने कुछ टूटे फूटे बिखरे बिखरे शब्द लाया
उन शब्दों को जोड़ा तो पढ़कर मैं हैरान हूँ
बताती हूँ आपको की क्यों इतनी परेशान हूँ
की कहती है प्रकृति खुद को बक्श दे ऐ मानव
क्यों स्वयं के लिए ही बन बैठा है दानव
मुझे चोट देकर तू भी क्या बच पायेगा
भविष्य में तू मुझे नही स्वयं को तड़पायेगा
आज मुझे बेदर्द कहता है
छोटा सा कहर ही बरपा जो
जंगल , खेत नष्ट किये जरा
उसका हिसाब लगाना तो
अपनी प्रगति के पीछे तू
पागल बन इतरा रहा
चकाचोंध से आँखे फेर
देख तू किस दलदल में जा रहा
अभी तो बेटा शुरुआत ही है
आगे आगे देख होता है क्या
ना ना ना मुझे जिम्मेदार ना ठहरा
इसका कारण तू ही बना
अब भी सुधर जा ये कड़कती बिजली
चेतावनी तुझको दे रही
मेरा अस्तित्व है जीवन तेरा
तुझे बार बार समझा रही
मत फैला प्रदूषण इतना
की दम तेरा ही घुट जाए
इंसान नही वो मुर्ख है
जिन्हें अब भी समझ में ना आये
मेरा स्वभाव है करतूत तेरी
इतना अब तू जान ले
शब्द नही है पास मेरे
मेरे इशारों को पहचान ले
अगर बचाना है जो जीवन तो
प्रकृति को सम्मान दे
शांत हो जाउंगी माँ हूँ तेरी
बस मुझको तू वो मान दे
मुझको वो सम्मान दे
*नूतन पू.त्रि.*
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