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लघुकथा- सत्य का ज्ञान

*"सत्य का ज्ञान"*

"आज हम होटल जाएंगे" "आज हम होटल जाएंगे"
बच्चे बहुत खुश है क्योंकि आज महीने का वह दिन है जब दादाजी "केशव जी" अपने पूरे परिवार को होटल खाने पर ले जाते है महीने में बस एक दिन।
होटल पहुँचते है। खाना ऑर्डर करते है। फिर जब वेटर खाना लेकर आता है तब ये क्या??? केशवजी अचानक भौचक्के से खड़े हो जाते है कुछ ही पल बीतते है कि अश्रुधारा बहने लगती है
परिवार के सदस्य कुछ कहे उससे पहले ही वो वेटर और केशवजी गले मिलकर रोने लगते है।
सभी आश्चर्यचकित से उन्हें देखते है और फिर बच्चे पूछते है दादाजी ये कौन है?
केशवजी कहते है - ये मेरे बचपन का यार है इसका नाम है "माधव"
बच्चे फिर आश्चर्य से पूछते है!
ये आपके बचपन के यार कैसे हो सकते है? ये तो कितने बूढ़े है और आप तो कितने जवान हो।
बच्चों इसका कारण में आपको बताता हूँ, "माधवजी ठक्क से मुस्कुराते हुए बोले"
दरअसल जब हम गाँव से शहर की और बढ़े थे। तब हम दोनों के बीच अलग सोच की एक दिवार खड़ी हो गयी थी और हम दोनों ही अपनी सोच को सही ठहराने में लगे रहते थे। एक दूसरे से कहते रहते थे की एक दिन तुझे *"सत्य का ज्ञान"* जरूर होगा और एक दूसरे की सोच को गलत साबित करने में लगे रहते थे। समय बीतता गया और हम अपनी अपनी सोच के साथ अपने अपने जीवन में लग गए और आज जब इतने सालों बाद मिले तो इसे देखकर आज मुझे एहसास हुआ की *"सत्य के ज्ञान"* की आवश्यकता मुझे थी इसे नही।
केशवजी के बच्चे तपाक से बोले- पर अंकल वो *"सत्य का ज्ञान"* है क्या? हमें भी तो बताइए।
मैं बताता हूँ "केशवजी बोले"
आज जो मैं तुम सभी को रोज योग करने का कहता हूँ, अपने अनुचित खान-पान पर लगाम लगाने को कहता हूँ, पैसो के पीछे कम और अच्छे कर्मों के पीछे अधिक भागने को कहता हूँ, लोगो की सहायता का कहता हूँ जो अक्सर तुम्हे चुभ जाती है। यही है *"सत्य का ज्ञान"* जो मैने सालो पहले इसे भी दिया था जो इसे अब समझ आ रहा।
हाँ यार "माधव जी बोले" मैं इसे कहता था कि जब तू बूढ़ा होगा तब तुझे पैसो की कीमत समझ आएगी लेकिन ये तो अब तक बूढ़ा हुआ नही पर मुझे बुढ़ापे में समझ आ रहा की मैने कितनी बड़ी गलती कर दी।
सारी उम्र पैसो के पीछे भागता रहा ना अपने स्वास्थ्य का कुछ सोचा और ना ही अपने बच्चों की परवरिश का। आज जब मेरे बच्चों ने मुझे घर से निकाल दिया, अब मेरे पास ना पैसे है, ना परिवार है, और ना ही स्वास्थ्य है और तेरे पास सबकुछ है। आज मुझे समझ आ रहा है कि योग की शक्ति क्या होती है, बच्चों की परवरिश क्या होती है और किसी की मदद करने पर मिली दुआ क्या होती है, इतना कहकर वह निराश हो गया।
तब केशवजी बोले- देर तो अब भी नही हुई है अब भी तेरा स्वास्थ्य तेरा जीवन तेरे हाथ में है तू कल से ही मेरे साथ योग शुरू कर, समाजसेवा शुरू कर फिर देख तेरा जीवन कैसे प्रफुल्लित हो उठता है।
बच्चे बोले- अंकल आज आपके साथ-साथ हमे भी *"सत्य के ज्ञान"* की अनुभूति हुई। अब कल से हम भी पिताजी की दिनचर्या और सोच का पालन करेंगे।
वहाँ होटल में उनकी बातें सुन रहे कई लोगो को भी *"सत्य का ज्ञान"* मिला और जिन्हें नही मिला वक्त उन्हें भी सीखा ही देगा अंतर इतना होगा की तब पश्चाताप ज्यादा होगा।

*तात्पर्य* - आज हमें सबसे अधिक आवश्यकता है *"सत्य के ज्ञान"* की।

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