मुंशी प्रेमचंद जी के नाम से ही
कितने किस्से ताजा हो जाते है,
यादो की गाड़ी पलट जाती
और हम अपने विद्यालय पहुँच जाते है,
हिंदी साहित्य जिनके लेखन से भरा है,
इनका नाम तो बड़ा है ही
पर इनका व्यक्तित्व भी गहरा है,
पूस की रात, बूढी दादी, गौदान
जैसी सामाजिक घटनाओं का किया चिंतन,
कई श्रेष्ठ रचनाएँ रची जिनमे मुख्य है
पंच परमेश्वर, मंत्र, नशा और गबन,
ऐसे लेखकों की महानता व
हमारे जीवन में हिंदी साहित्य का व
हिंदी साहित्य में मुंशी प्रेमचंद जी का
महत्च हमे तब कहा समझ आता था,
तब तो बस कुछ रचनाएं
सामान्य सा जीवन परिचय और
हिंदी साहित्य में लेखकों का थोड़ा योगदान समझकर
बस एक रट्टा लगाना होता था,
बस किसी तरह थोड़ा बहुत लिखकर
पास हो जाये,
और परीक्षा होते ही सब कुछ
भूल जाये,
ये तो हुई हमारी पीढ़ी की बात,
पर हमसे पहले की पीढ़ियों को
होता था काफी कुछ याद,
फिर बात करे उससे पहले की पीढ़ी की
तो उन्होंने तो हिंदी साहित्य में जी जान लगाकर
दी हिंदी साहित्य को सम्मान भरी सौगात,
कहने का तात्पर्य यह है कि हम
पीढ़ी दर पीढ़ी घटते चले आ रहे है,
अपनी मातृभाषा का साहित्य
रटते चले आ रहे है,
और अब बात करू अबकी
पीढ़ी की
जो अंग्रेजी माध्यम में पढ़कर
इतरा रही है,
हमारी मातृभाषा बस एक विषय में
सिमटती जा रही है,
आज की ही बात करू
तो कुछ बच्चों को मेने कहते सुना,
बस 10वी तक ही पढ़ना है हिंदी
फिर तो उसे अतिरिक्त में ही चुनना,
जब ये शब्द सुने तो जैसे धक्का सा लगा,
अपनी मातृभाषा का भविष्य जैसे ढलता सा दिखा,
जो बच्चे होने वाले है हमारे देश का भविष्य,
क्या कहूँ उनसे जो पूरी तरह बन चुके है
अंग्रेजो के शिष्य,
आज मुंशी प्रेमचंद जी के जन्म दिवस पर
सबसे एक विनती है,
अपने बच्चों को ये समझाओ की
हमारी मातृभाषा हिंदी है,
हाथों पर हाथ धरे कृपया ऐसे ना बैठे रहो,
मातृभाषा पुकारती है उन्हें बचाने के लिए
चलो आगे बढ़ो,
थोड़ा ही सही पर कुछ तो करो,
कुछ तो करो।
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