देखो तो देखो
क्या गजब हो गया,
इंसान का दर्द बस
अख़बार में बस गया,
कही बरसाती झड़ियाँ आई
तो कही हुआ त्राहिमाम,
बाप रे ये क्या हो गया
बस इतना कहकर
हुआ काम तमाम,
ना किसी को कुछ फर्क पड़ता है
ना किसी की कोई अड़ी है,
पीड़ितो को कोई मदद नही
इंसानियत तो कही
कोने में पड़ी है,
बड़ी बड़ी खबर बनाना है सबको
वो ढूंढते है नजारे,
हर जगह की गिनती लगाते
की बाढ़ ने कहा कितने मारे?
जितनी संख्या ज्यादा होगी
उतनी होगी टी आर पी,
ऐसी सोच रखने वालों की तो
उतारनी चाहिए आरती,
मानते है कि अख़बार, टीवी
जरिया है मध्यस्थता का,
पर खबर पर ही ध्यान देना
इससे बुरा और क्या होगा?
लोग भी तो मजे लेने को
सारी खबरे पढ़ते है,
फिर बाद में मिल बैठकर
गपशप सारी करते है,
घोटाले पर घोटाले
देख कर मन दुःखता है,
पीड़ितो से उनका
मुआवजा तक छीन लेते
ऐसे लोगो पर बाढ़ का पानी
क्यों नही टूटता है?
खबरों को पढ़ पढ़कर तो
हर किसी का दिल
दहकता है,
पर बाढ़ पीड़ितों पर
क्या बीत रही
उनका दर्द कोई नही समझता है,
कोई नही समझता है!
आज अचानक मन बह गया उस और भ्रुण हत्या के मामले दर्ज है चहू और सोचा इस पाप के खिलाफ मैं भी करू कुछ कोशिश ज्यादा कुछ नही तो अपनी कविता मैं ही कुछ लिख भ्रुण हत्या के खिलाफ मैने भी ए...
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