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क्या सही? क्या गलत?

कुछ बाते जो अनुभव की
वह आपको भी बताती हूँ,
लोगो की मानसिकता को
अपनी कविता से दर्शाती हूँ।

ना जाने लोग तर्को को
किस तराजू में तोलते है,
ऊपर तापर देखकर ही
सही को गलत और
गलत को सही बोलते है।

*प्रश्न है कि बच्चों का भविष्य कैसे बनेगा?*
*गहराई में यदि सोचोगे तो देखना*
*आपको भी नही जमेगा*

बच्चों को सिखलाने का
इनका अंदाज़ तो देखो,
जो मन में आये वही करो
जो मन ना करे वो फेंको।

बच्चों को भजन सिखलाना
उनके बचपने पर बोझ
जबकि भक्ति से मिलता है सुकून,
और फ़िल्मी, अश्लील, इश्क के
गीत सिखाने से तो उत्तम बनती ना सोच
जबकि ऐसे गीत है बचपने का खून।

*वाह रे वाह क्या बात है......*

बच्चों को धार्मिक पुस्तके पढ़ाना
उनके बचपने पर बोझ
जबकि सिद्ध है कि यह ज्ञान है सटीक,
पर बच्चों को फिल्मे दिखाकर
फ़िल्मी ज्ञान देने से तो जीवन सुधरता ना रोज
जबकि अनावश्यक है यह सीख।

*वाह रे वाह क्या बात है......*

बच्चों को सभ्य कपड़े पहनाना
उनके बचपने पर बोझ
जबकि सभ्यता ही है श्रेष्ठ संस्कृति,
पर बच्चों को अंग प्रदर्शन सिखाने से तो
बढ़ता ना उनका ओज
जबकि अश्लीलता है मानसिक विकृति।

*वाह रे वाह क्या बात है......*

कभी कभी सख्ती से ही सही
पर बच्चों को अच्छी बातें सिखाना
उनके बचपने पर बोझ
जबकि बचपन का ज्ञान जीवन भर रहता है,
पर बच्चों को समझाने की बजाय
रटाकर ही सही लेकिन अव्वल
आने के लिए बाधित करने से तो
वो भविष्य में करेंगे ना खोज
जबकि डिग्री का ज्ञान मौन रहता है।

*वाह रे वाह क्या बात है......*

सही, गलत में फर्क तो पता नही
और चले है सनातन संस्कृति को पलटाने
ऐसे तो हालात है,
*वाह रे वाह जमाने तेरी भी क्या बात है.......।*

*नूतन पू.त्रि.*

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