नारी की कोई होड़ नही,
जो वो कर सकती है उसका कोई तोड़ नही,
शीतला सप्तमी की बात मैं बताती हूँ,
आपको शीतला माता मंदिर ले जाती हूँ,
जहाँ छोटे से मंदिर में उमड़ती है भीड़,
हाथ में पूजन थाली और लोटे में नीर,
धक्का-मुक्की ऐसी की औरते बुरी तरह दब जाए,
पर संतुलन ऐसा की पूजन सामग्री ना मिल पाए,
जहाँ खुद को संभालना मुश्किल है
वहाँ थाल हाथों पर टिका लेती है,
दही, दूध भी सलामत रहता
और पल्लू भी सर से सटा लेती है,
१०० मी. का रास्ता भी १ कि.मी. दिखाई देता,
घंटे भर की मशक्कत के बाद
मय्या से मिलन का मौका आता,
दही, दूध से मय्या की गर्माहट को ठंडा करते,
मात्र एक दिवस के पूजन पर
माँ वर्ष भर रक्षा करते,
श्रद्धा, भक्ति कोई खेल नही,
इसकी शक्ति का मेल नही,
जब मन करुणा से बंध जाये
वो रस है कोई जेल नही,
भारतीय संस्कृति को अपनाना
जिसमे कोई जोड़ नही,
भारतीय नारी की कोई होड़ नही,
जो वो कर सकती है उसका कोई तोड़ नही।
*नूतन पू.त्रि.*
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