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पहनावे की आजादी- लेख

*वस्त्रों की मर्यादा व बंदिश में अंतर समझना अति आवश्यक है।*

देश की आजादी के बाद स्त्रियों की आजादी की कहानी शुरू होती है....। जो पर्दा प्रथा से शुरू होकर जीन्स टॉप तक पहुँच चुकी है लेकिन कारवाँ अब भी जारी है....।

आजकल स्त्रियों के लिए आजादी का मतलब बस अपने पसन्द के कपड़े पहनने जितना ही रह गया है। जिसके लिए अत्याचार, हम अबला नही है, तरक्की में रूकावट जैसे बहाने दिए जाते है जो की सारे निरर्थक है। 

अभी कुछ दिन पहले एक मैसेज आया- *की कोई जीन्स पहनकर भी सम्मान देती है तो कोई घूंघट में भी गाली देती है।*   
अब यहाँ दो अलग अलग बातों को जोड़ दिया, पहनावा और तमीज..। अरे! कपड़े कोई जादू की छड़ी है क्या जो पहना और सीरत बदल गयी? हाँ काफी हद तक कपड़ो का प्रभाव पड़ता है पर वो भी आपकी सोच अनुसार क्योकि कपड़े पूरा व्यक्तित्व नही अपितु व्यक्तित्व का एक हिस्सा है। 
ऐसे तो मैं भी कह दूँ *की हमने मर्यादा में रहकर भी स्त्री को परिवार का नाम रोशन करते देखा है व पूरी आजादी मिलने के बाद भी परिवार को कोर्ट में घसीटते देखा है।* 

कहने का मतलब यह की स्त्रियों का पहनावा जो दिन प्रतिदिन छोटा होता जा रहा है असल में वो कोई आजादी नही और ना ही आवश्यकता है बस उनके क्षण भर के शौक मात्र है और *अपने इस शौक को पूरा करने के लिए मर्यादित विचारों को दखियानुसी की संज्ञा दे देती है और मर्यादा के स्वच्छ अर्थ का अनर्थ कर देती है।*

यदि स्त्री की कपड़ो की मर्यादा तरक्की में अड़चन होती तो *रानी लक्ष्मीबाई, अहिल्या बाई, रानी दुर्गावती, जीजाबाई और आज के समय में लता मंगेशकर जी* जैसे हजारो नाम प्रचलित नही होते।
वास्तव में जो स्त्री की आजादी में अड़चन है वह है- पढ़ाई पर रोक, कुछ नया करने पर रोक, बाहर निकलने पर रोक, विचारों की अस्वतंत्रता, पर्दा प्रथा जैसी बंदिशें....। लेकिन मर्यादा को बंदिश कहना अनुचित है और वैसे भी अश्लील कपड़े पहनकर स्त्रियों ने कौन से झंडे गाढ़ लिए जरा बताना तो......।

तात्पर्य सिर्फ इतना है कि पहनावे की मर्यादा व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा है जो अति आवश्यक है।

*इन बातों को आप वास्तविक रूप में भी समझ सकते हो...। आप दो दिन सिर्फ जल के सहारे रहना और उससे अगर आपका स्वाथ्य बिगड़े तो तीसरे दिन से जल त्याग देना यह कहकर की "जल ही जीवन है" यह वाक्य झूठा है। अर्थात सिर्फ जल के साथ जीवन नही होता पर जल के बिना भी जीवन नही होता।*

*उसी प्रकार सिर्फ कपड़ो की मर्यादा से अच्छा व्यक्तित्व नही बनता और कपड़ो की मर्यादा के बिना भी अच्छा व्यक्तित्व नही बनता।*

*अंत में बस इतना ही की अपनी सोच का स्तर बढ़ाओ, आजादी के नाम पर अश्लीलता ना फैलाओ......।*

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