आज जब टेक्नोलॉजी से
सभी का जीवन आसान है,
तो फिर माँ अकेली क्यों
ममता तले परेशान रहे?
बच्चों को संभालना अब तो
बाएँ हाथ का खेल है,
टेक्नोलॉजी से बच्चों का बस
करवाना मेल जोल है,
अब समय वो कहा रहा
जब थाली लेकर माँ भागे,
मोबाइल, टीवी चालू कर
क्षण भर में काम यह निपटा दे,
धूल में लिपटकर गंदे होकर
अब बच्चे कहा आते है?
घर में ही मोबाइल चलाकर
ऊर्जा को बचाते है,
अब ना सताना, ना तड़पाना,
ना गिरना, ना चोट लगाना,
बचपने पर हावी मोबाइल
अब ना कोई शरारत करना,
पागल थी वो माएँ जो
बच्चों के पीछे दिनभर पिसती,
आज की माँ से सीखो कैसे
मोबाइल थमाकर आराम करती,
एक छोटी सी चीज है जो
हर काम माँ का निपटा देती,
अच्छा ही सब मानो जो
यह टेक्नोलॉजी सीखा देती,
संस्कारो की जरूरत क्या?
सेहत का क्या काम?
बड़े तो यु भी हो जायेंगे
दवाईयाँ होगी आम,
त्याग, समर्पण थी जो सूरत
स्वार्थी मूरत हो गयी,
ममतामयी जो माँ होती थी
टेक्निकल अब हो गयी....।
माफ़ करना जो बुरा लगे तो
लेकिन सच जो दिखे यहाँ,
कैसे हो बर्दाश्त जो लापरवाही में
बच्चों का भविष्य ढहा....।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें