एक बार हमारे घर पर केरी का अचार डल रहा था जो माँ डाल रहे थे तब वो हर चीज़ की मात्रा अगले कमरे में बैठे दादीजी को दिखाने जाते की यह इतना लू ठीक रहेगा ना... यह देखकर में फुस्स से हँस पड़ी और बोली माँ आपको इतने साल हो गए अचार डालते पर अभी तक आपको याद नही हुआ की कौन सी चीज कितनी डलेगी.....।
तब माँ ने कहा- *"ऐसा नही है कि मुझे पता नही पर दादीजी से इसीलिए पूछती हूँ ताकि उन्हें यह एहसास रहे की बुजुर्ग होने पर भी हमारे लिए उनका मूल्य वही है जो पहले था.....।"*
यह वो सीख थी जिसका तरीका साधारण था लेकिन मूल्य कही ज्यादा कीमती था।
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