*टिड्डी से संवाद*
एक टिड्डी मुझसे टकरा गई,
झुंड से बिछडकर रो रही थी
तो दया मुझको आ गयी,
फिर मेने सोचा अरे!
ये दया के नही है काबिल,
खेत इतने उजाड़ दिए
खड़ी कर रहे मुश्किल,
पर चूंकि वो अकेली थी
तो जोर जमाना ठीक नही,
इसीलिए धीरे से पूछा
क्या हुआ तुम रो क्यों रही?
बोली झुंड खो गया डर रही
सुना है तुम हमे भी खाते,
पर हमें जो ईश्वर ने दिया
हम तो बस वही है खाते,
तुम इंसानो के मारे तो
पूरी प्रकृति परेशान है,
दिमाग सही से क्यों ना चलाते?
वो तो तुम्हारी शान है,
अब परिस्थिति हुई ये
की समझ मुझे ना आ रहा,
कौन गलत है और किसे
गुनहगार ठहरा रहा,
फिर मेने कहा उसे
कोशिश पूरी करेंगे,
खुद समझेंगे और दुनिया
वालो को भी समझायेंगे,
और रही बात तुम्हे खाने की
तो ये चीन नही भारत है,
जो काफी कुछ बदल गया
पर अब भी बहुत कुछ जाग्रत है,
उसे कहा अब तुम उड़ जाओ
पर अब और हमे ना सताना,
वो भी टांट गजब की दे गयी
बोली कोशिश करेंगे
पर पहले तुम दिमाग वालो तो सुधर जाना...।
*नूतन पू.त्रि.*
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