कौन हूँ मैं?
कहने को तो आप लोगो का भगवान हूँ पर क्या मैं वास्तव में भगवान हूँ?
भगवान कौन होते है? इस पूरी सृष्टि के रचयिता, आप के रचयिता। पर क्या आप इस बात को गम्भीरता से लेते हो?
आपकी हर समस्या को लेकर आप (सभी भारतवासी) हमारे पास आते हो समस्या हल मिला तो पूजोगे वरना कभी नही पूछोगे।
कुछ मनुष्य कहते है भारत में इतनी पूजा पाठ होती है फिर भी भारत आगे क्यों नही बढ़ता? विदेशी पूजा पाठ नही करते फिर भी सुखी दिखाई देते है।
ये सत्य है कि भारतीय पूजा पाठ में अग्रणी है किंतु उतने ही अग्रणी भारत के मनुष्य हमारा अपमान करने में है यह भी एक सत्य है।
हम तो आपकी श्रद्धा की आस लगाते है और आप हमें लालची जानकर कभी रूपये तो कभी किसी अन्य वस्तु का लोभ दिखाते है।
आज का समय है जब भारत में हमारी पूजा कम अपितु हमारा अपमान अधिक होता है। अरे हम तो कण कण में है ही किन्तु आप यह जानने के बजाय हमे कण कण में दिखाने की कोशिश करते हो और हमारा अपमान करते हो।
स्पष्ट रूप से कहते है हमारा तात्पर्य क्या है?
कुछ दिनों पूर्व हम धरतीलोक भृमण पर आये थे। वैसे तो हमे परिस्थितियां ज्ञात थी किन्तु अब जब हमने स्वयं आकर महसूस की तो मन को बड़ा आघात हुआ। जिस भारतवर्ष में हमारे परमभक्त मीरा व सूरदास जैसे व्यक्तित्व रहे जिन्होंने हमारे मान सम्मान के खातिर अपने जीवन दांव पर लगा दिए उसी भारतवर्ष में पल-पल पर हमारा अपमान हुआ। भारतवासी भक्ति का नाम लेकर हमारी छवि हर जगह उकेर देते है जिससे भक्ति भाव तो जाग्रत होते नही किन्तु उन छवियों को रौंदकर अपमान जरूर किया जाता है। आज कोई भी पृष्ठ पर, किसी भी वस्त्र पर, किसी भी वस्तु पर हमारी छवि उकेर दी जाती है और उपयोग समाप्त होते ही उस वस्तु के साथ हम कही कूड़ेदान तो कही सड़कों पर मनुष्य जानवरो के पैरों तले रौंद दिए जाते है, क्या यही है आप लोगो की भक्ति?
यही सोच रहे थे की सड़क पर भृमण करते हमारे पैरों में सरस्वती कपुर का खाली पुड़ा आया जिसमे विद्या की देवी माँ सरस्वती की छवि थी जिसे पैरों में देखकर हमें घोर दुःख हुआ। तभी एक भक्त ने सम्मान देकर उन्हें उठाया और विसर्जन किया किन्तु उसके पूर्व कई श्रद्धालु जो प्रतिदिन मंदिर आकर हमारा पूजन करते है माँ सरस्वती की छवि को देखकर भी अनदेखा कर गए, क्या इतना ही है भारत में हमारा मान? वही कुछ दूर चलने पर हमारे पैरों में एकदन्त, गणेश जिन्हें आप प्रथम पूजते हो उनकी छवि एक पत्रिका पर उकेरी हुई आई जिसे देखकर फिर हमें घोर दुःख हुआ अब बस हमारे आँखों से अश्रुधारा बहने की ही देर थी की एक चंदन की खाली डिब्बी को हमारी ठोकर लगी जिसमे शिव शम्भू स्वयं महादेव की छवि थी। सृष्टि के संरक्षक महादेव की छवि को हमारी ठोकर लगी तो हमे घोर पाप का आभास हुआ और आप मनुष्य कितनी आसानी से उन्हें रौंद गये। हमने कई भक्तों के मन के भाव पढ़े जो हमारी छवि को इस तरह पाकर काफी आहत हुए किन्तु वही दुःखी होकर चले गए।
हम तो हमारे द्वारा बनाई सुंदर धरती का आनंद लेने आये थे नही जानते थे इस तरह दुःखी व अपमानित होकर लौटेंगे।
सभी ने हम भगवानों को मजाक बनाकर रख दिया है। आप वैसे यदि किसी वस्तु से प्रेम करते हो तो उसे गिरने तक नही देते तो अब क्या हम हमारा मूल्य किसी निर्जीव वस्तु से भी कम आंके? एक समय था जब विद्या स्वरुप पुस्तको को यदि गलती से भी पैर लग जाता था तो हाथ जोड़कर क्षमा मांगी जाती थी और आज विद्या की देवी की छवि पैरों में आती है और किसी को कुछ फर्क नही पड़ता।
आप मनुष्य हमारी पूजा, आराधना व आव्हान कर हमें बुलाते हो फिर इस तरह हमे अपमानित कर लौटाते हो। यदि आप हमारा सम्मान नही कर सकते तो आपको हमे पूजने का, हमारी भक्ति करने का, हमसे कुछ विनती करने का या हमे किसी भी बात के लिए दोष देने का कोई अधिकार नही है बाकी हम तो ईश्वर है अपना कर्तव्य निभाकर आपको आपके कर्मों का फल स्वतः ही दे देंगे।
देश में कुछ नियम हमारे सम्मान में लागू करवाने का कर्तव्य आपका है। हम चाहेंगे की हमारी छवि किसी धातु के अतिरिक्त कहि पर भी उकेरने पर सख्त मनाही हो। ना कागज, ना कोई वस्त्र और ना ही कोई पत्रिका पर देवी देवताओं की छवि उकेरी जाये और यह सुधार शीघ्र हो तो बेहतर है........।
*धरतीलोक पर आकर बड़े आहत हुए*
*आपके भगवान*
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें