आज बनाया कोट किला
तरह तरह की चीज़ों से,
गोबर से आकार दिया
फिर सजा चमकीले कागज से,
भुट्टे का है ढोल यहाँ पर
गेंहू, ज्वार की आँखे है,
सुंदर रथ में भरतार जी
संजा को लेने आते है,
कौआ, मिट्ठु, सोलह सखियाँ
जाड़ी जसोदा, पतली पेम,
सोलह दिन का उत्साह लेकर
आती अपनी संजा बेन,
नई कलाएँ आजमाने को
मौके खूब मिलेंगे ही,
पर पुरानी कलाओ का आनन्द मिल रहा
वह है हमारी खुशकिस्मती....।
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