शौक हमारे खुनी है
कातिल, पापी, हत्यारे है,
ऐसे शौक जो उचित नही
बस वही तो हमको प्यारे है,
अपने शौक के खातिर हमने
जानवरो को मार दिया,
बेफिजूल की जरूरतों पर
जंगल का जंगल उजाड़ दिया,
थोड़ी भी लज्जा, शर्म
अब हममे बाकि नही रही,
बिल्डिंगे खूब खड़ी हुई
पर खेत दिखाई दे कही नही,
मस्ती के गुलछर्रो में हम
तनिक भर ना सम्भल रहे,
देख देख बेशर्मी हमारी
ईश्वर लज्जित हो रहे,
प्रकृति भी कलप रही
ईश्वर ये कहाँ मुझे छोड़ दिया?
इन इंसानो ने मेरे
वजूद को ही निचोड़ दिया,
ईश्वर बोले मैं भी हूँ
शर्मिंदा अपनी रचना पर,
अब तो बस तुम दिखा ही दो
प्रकोप इन इंसानो पर,
शुरू कर रही प्रकृति भी
प्रकोप उसका झेलना है,
कम है अभी तो समझ ले हम
हमे गिरने से सम्भलना है,
एक बार जो समय गया ये
इससे बुरा अब आएगा,
पता नही वो कौन सा जादू
इंसानों को समझायेगा....।
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