डर, जैसे निभानी कोई रीत है,
डर, जिससे हो जाती प्रीत है,
डर, जिसके साये से भी डर लगता है,
तभी तो वो हर कदम पर साथ चलता है,
डर, जिससे रिश्ता ना कोई गहरा है,
डर, जिसका फिर भी हम पर पहरा है,
डर, ना चाहो तब भी आता है,
डर, क्यो अपनापन निभाता है?
डर, हर मजबूती खाता है,
डर, जो भुक्कड़ कहलाता है,
डर, ना हो तो सुकून है,
लेकिन डर,
खिंच लेता जहन्नुम में...।
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