*वीर रस की कवि हूँ मैं*
श्रृंगार रस की कवि हूँ मैं,
पतली सी आवाज है मेरी
नाजुकता की छवि हूँ मैं,
पर हर नारी कोमल है
यह बात सुनो सब झूठ है,
नाजुक, कोमल के साथ शक्ति भी
वीरांगनायें सबूत है,
श्रृंगार रस में रचना लिखना
मुझे तो कहा आता है,
वीर रस में लिखना, सुनना
आनन्द मुझे दिलाता है,
तपन से अपनी रोशन करे
चमचमाता रवि हूँ मैं,
कोमल, नाजुक नारी हूँ बेशक
पर वीर रस की कवि हूँ मैं....।
*पूजा ओझा (नूतन पू.त्रि.)*
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