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पिता

" पिता ", शब्द में ही व्यक्तित्व झलकता है, अर्थात जो परिवार की, बच्चों की सभी समस्याओ को पी जाता है। हर व्यक्ति अपने जीवन में अनेको बार दो राहो पर आकर खड़ा होता है जब उसके लिए सही दिशा चुनना कठिन हो जाता है ऐसे समय पर पिता का मार्गदर्शन सही राह चुनने में उसकी सहायता करता है। कहने का तात्पर्य यह नहीं की पिता सर्वश्रेष्ठ व अपने जीवन में पूर्णतः व हर मोड़ पर सफल ही होता है क्योंकि पिता भी मनुष्य होता है तो गलतियां स्वाभाविक है किन्तु पिता वो व्यक्तित्व होता है जो स्वयं की गलतियों की आंच कभी अपने बच्चों पर नहीं आने देता। वह स्वयं के जीवन में गलतियां करता है किन्तु अपने बच्चों के जीवन को लेकर पेनी नजर रखता है और कोई चूक न होने का हर सम्भव प्रयास करता है। पिता की जिम्मेदारियां साधारण नहीं होती। बच्चे के जन्म लेने से ही अर्थात पिता की उपाधि मिलने से ही पिता की जिम्मेदारियां शुरू हो जाती है। बच्चे को घुमाना, उसकी जरूरतें पूरी करना, उसकी इच्छाएं पूरी करना, उसकी गलत जिद पर उसे इस तरह से समझाना की वो समझ भी जाए और रूठें भी ना, उसे चलना सिखाना से लेकर उसके करियर तक उसे हर मोड़ पर समझना और समझाना। एक पुरुष जब पिता बनता है तब अपने बच्चे को सिखाते-सिखाते वह खुद में भी वो बदलाव लाता है जो उसने कभी किसी के कहने पर नहीं किये क्योंकि वह चाहता है की उसका बच्चा उससे वह सीखे जो उसके बच्चे का जीवन संवार दे। पिता पद की उपाधि व्यक्ति के जीवन को नई दिशा देती है।

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